और कितनी निर्भया?
एक सपना है , एक आस है , हर रोज़ जीवित रह पाने का ये राज़ है। क्योंकि रूह तो उस रात ही सहम गई थी , उनकी आँखों में थोड़ी भी रहम नहीं थी। वो रोई , भारत भी रोया था , उसकी साँसें थम जाने पर सारा ब्रह्मांड शोकाकुल हो गया था। निर्भया की चीख और आँसू आज भी हर माँ का बुरा सपना है , पर सच्चाई तो ये है निर्भया एक नहीं , अनेक है , डर लगता है , समझ नहीं कौन बस एक मुखौटा और कौन सच में अपना है ? भारत की जान है दिल्ली , भारत की पहचान है दिल्ली , पर क्या दिल्ली का सर्वोच्च न्यायालय एक मौन श्मशान है ? जहाँ मासूमों की चीखें , उनकी पुकार बस दफ़्न हो जाती हैं , उनको सुनता कोई नहीं , वो माँ का हाल पूछता है कौन , जो न जाने कितने सालों से सोई नहीं। क्या समझते है वो अपनों को खोने का दुख ? वो हर एक माँ का दुख , जो न्याय के लिए तरसती है , और उस हर एक माँ का जिनकी जान अब भी उनकी बेटी में बसती है। और हम बेटियों की क्या बात करें , हम बेटि...