और कितनी निर्भया?

 


एक सपना है, एक आस है,
हर रोज़ जीवित रह पाने का ये राज़ है।
क्योंकि रूह तो उस रात ही सहम गई थी,
उनकी आँखों में थोड़ी भी रहम नहीं थी।
वो रोई, भारत भी रोया था,
उसकी साँसें थम जाने पर
सारा ब्रह्मांड शोकाकुल हो गया था।

निर्भया की चीख और आँसू
आज भी हर माँ का बुरा सपना है,
पर सच्चाई तो ये है
निर्भया एक नहीं, अनेक है,
डर लगता है, समझ नहीं
कौन बस एक मुखौटा
और कौन सच में अपना है?

भारत की जान है दिल्ली,
भारत की पहचान है दिल्ली,
पर क्या दिल्ली का सर्वोच्च न्यायालय
एक मौन श्मशान है?
जहाँ मासूमों की चीखें, उनकी पुकार
बस दफ़्न हो जाती हैं,
उनको सुनता कोई नहीं,
वो माँ का हाल पूछता है कौन,
जो जाने कितने सालों से सोई नहीं।
क्या समझते है वो
अपनों को खोने का दुख?
वो हर एक माँ का दुख,
जो न्याय के लिए तरसती है,
और उस हर एक माँ का
जिनकी जान अब भी उनकी बेटी में बसती है।

और हम बेटियों की क्या बात करें,
हम बेटियों को भी अपनी माँ की फ़िक्र बहुत है,
क्योंकि इंसान तो नहीं, वो पशु समान प्रवृत्ति के लोग,
उम्र नहीं देखते,
जो पशु को नहीं बख़्शते,
वो माँ या बुज़ुर्ग या मुर्दों पर भी
रहम थोड़ी करते हैं।
गहराई से सोचें न्यायाधीश महोदय,
ये दरिंदे क्यों नहीं सुधरते हैं?
क्या चूक है, क्या भूल है,
इतनी कमज़ोर है न्याय की डोर!
जैसे चाय में दूध हो,
जैसे शरीर में रूह महफ़ूज़ हो।
जैसे आसमान हो बेरंग, खो जाए चाँद और सितारे,
जैसे भारत हो, पर राम हों हमारे।
जैसे बेस्वाद हो जाए सारे मीठे पकवान,
और मंदिरों से लापता हो जाए भगवान।

तो एक सपना है, एक आस है,
जिससे हम अब भी मुस्कुरा रहे हैं,
आस है कि कल बेहतर होगा,
भारत में भारत की बेटियाँ महफ़ूज़ होंगी।
साफ़ हवा, पानी और साफ़ समाज की सोच होगी।
तभी तो बढ़ेगा भारत?
शाम होते ही अगर आधी आबादी के लिए
देश बंद हो जाए,
तो क्या बढ़ेगा भारत?
डर-डर के, उनकी धमकियों से
अपने हाथों से अपना गला घोंट ले,
तो क्या बढ़ेगा भारत?
स्त्री को अपनी संपत्ति नहीं, माता लक्ष्मी समझे,
या भगवान नहीं, तो केवल उसे इंसान समझे,
स्त्री के अपमान को इंसानियत का अपमान समझे,
तभी तो सही मायनों में बढ़ेगा भारत?



#India_Against_Rape
India Stands United for Tough Laws Against Rapists!


 

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